श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 92: राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.92.15 
अदाता ह्यनतिस्नेहो दण्डेनावर्तयन् प्रजा:।
साहसप्रकृती राजा क्षिप्रमेव विनश्यति॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जो राजा दुस्साहसी है, दान नहीं देता, स्नेह से रहित है और बार-बार दण्ड द्वारा अपनी प्रजा को सताता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥15॥
 
A king who is daring, does not give charity, is devoid of affection and repeatedly harasses his subjects by punishment, is soon destroyed. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)