श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 92: राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.92.14 
एवं यो धर्मसंरम्भी धर्मार्थपरिचिन्तक:।
अर्थान् समीक्ष्य भजते स ध्रुवं महदश्नुते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य धर्म में तत्पर है, धर्म और अर्थ (धन) का चिन्तन करता है, तथा जो अर्थ का विचार करके उसका उपयोग करता है, वह निश्चय ही महान फल प्राप्त करता है ॥14॥
 
He who is devoted to Dharma and contemplates upon Dharma and Artha (wealth), and who uses Artha after due deliberation on it, certainly attains great fruit. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)