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mahabharat 12.91.48: हे प्रिये! जो राजा सामर्थ्यहीन है, वह अपनी प्रजा की रक्षा कभी नहीं कर सकता, क्योंकि राज्य चलाना बड़ा कठिन कार्य है और बड़ा भारी बोझ है ॥48॥   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.91.48 
न जात्वदक्षो नृपति: प्रजा: शक्नोति रक्षितुम्।
भारो हि सुमहांस्तात राज्यं नाम सुदुष्करम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! जो राजा सामर्थ्यहीन है, वह अपनी प्रजा की रक्षा कभी नहीं कर सकता, क्योंकि राज्य चलाना बड़ा कठिन कार्य है और बड़ा भारी बोझ है ॥48॥
 
O dear! A king who is not capable can never protect his subjects because running a kingdom is a very difficult task and a very heavy burden. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)