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mahabharat 12.91.43: जब राजा पुरोहितों, पुरोहितों और गुरुजनों का अनादर किए बिना आदर करता है और उनके साथ उचित आदर का व्यवहार करता है, तब वह राजा का धर्म कहलाता है ॥43॥   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.91.43 
ऋत्विक् पुरोहिताचार्यान् सत्कृत्यानवमन्य च।
यदा सम्यक् प्रगृह्णाति स राज्ञो धर्म उच्यते॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जब राजा पुरोहितों, पुरोहितों और गुरुजनों का अनादर किए बिना आदर करता है और उनके साथ उचित आदर का व्यवहार करता है, तब वह राजा का धर्म कहलाता है ॥43॥
 
When a king respects the priests, priests and teachers without any disrespect and treats them with due respect, then it is called the Dharma of a king. ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)