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mahabharat 12.91.39: जो मित्रों की संख्या बढ़ाता है, शत्रुओं का नाश करता है और सज्जनों का आदर करता है, उसे राजा का कर्तव्य कहा गया है।   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.91.39 
विवर्धयति मित्राणि तथारींश्चापि कर्षति।
सम्पूजयति साधूंश्च स राज्ञो धर्म उच्यते॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
जो मित्रों की संख्या बढ़ाता है, शत्रुओं का नाश करता है और सज्जनों का आदर करता है, उसे राजा का कर्तव्य कहा गया है।
 
He who increases the number of friends, destroys his enemies and respects the virtuous is called the duty of a king. 39.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)