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mahabharat 12.91.38: जब वह दरिद्र, अनाथ और वृद्धों के आँसू पोंछता है और इस व्यवहार से सबके हृदय में आनन्द पहुँचाता है, तब उसकी सद्भावना राजा का धर्म कहलाती है।   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.91.38 
कृपणानाथवृद्धानां यदाश्रु परिमार्जति।
हर्षं संजनयन् नॄणां स राज्ञो धर्म उच्यते॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
जब वह दरिद्र, अनाथ और वृद्धों के आँसू पोंछता है और इस व्यवहार से सबके हृदय में आनन्द पहुँचाता है, तब उसकी सद्भावना राजा का धर्म कहलाती है।
 
When he wipes away the tears of the poor, the orphan and the aged and by this behaviour brings joy to the hearts of all, then his goodwill is called the Dharma of a king. 38.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)