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mahabharat 12.91.37: जब वह राग-द्वेष का त्याग करके भक्तिपूर्वक यथोचित दक्षिणा देकर पूजा करता है, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.91.37 
यदाऽऽप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्यजते श्रद्धयान्वित:।
कामद्वेषावनादृत्य स राज्ञो धर्म उच्यते॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जब वह राग-द्वेष का त्याग करके भक्तिपूर्वक यथोचित दक्षिणा देकर पूजा करता है, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।
 
When he disregards attachment and hatred and worships with devotion by offering sufficient dakshina, then it is called the religion of a king. 37.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)