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mahabharat 12.91.36: जब राजा अपने पुत्रों के समान वणिकों की रक्षा करता है और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, तब वह भी राजा का धर्म कहलाता है। 36.   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.91.36 
यदा शारणिकान् राजा पुत्रवत् परिरक्षति।
भिनत्ति च न मर्यादां स राज्ञो धर्म उच्यते॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
जब राजा अपने पुत्रों के समान वणिकों की रक्षा करता है और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, तब वह भी राजा का धर्म कहलाता है। 36.
 
When the king protects the merchants like his own sons and does not violate the limits of Dharma, then that too is called the Dharma of a king. 36.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)