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mahabharat 12.91.33: जब राजा दुर्बल प्रजा को आवश्यक वस्तुएँ देकर स्वयं खाता है, तब वे दुर्बल प्रजा बलवान हो जाती हैं। वह त्याग राजा का धर्म कहा गया है।   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.91.33 
संविभज्य यदा भुङ्‍क्ते नृपतिर्दुर्बलान् नरान्।
तदा भवन्ति बलिन: स राज्ञो धर्म उच्यते॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जब राजा दुर्बल प्रजा को आवश्यक वस्तुएँ देकर स्वयं खाता है, तब वे दुर्बल प्रजा बलवान हो जाती हैं। वह त्याग राजा का धर्म कहा गया है।
 
When the king gives the necessary things to the weak people and then eats himself, then those weak people become strong. That sacrifice is said to be the Dharma of the king. 33.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)