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mahabharat 12.91.32: जब वह मन, वाणी और शरीर से सबकी रक्षा करता है और अपने पुत्र के पापों को भी क्षमा नहीं करता, तब उसका आचरण भी 'राजा का कर्तव्य' कहलाता है ॥32॥   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.91.32 
त्रायते हि यदा सर्वं वाचा कायेन कर्मणा।
पुत्रस्यापि न मृष्येच्च स राज्ञो धर्म उच्यते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जब वह मन, वाणी और शरीर से सबकी रक्षा करता है और अपने पुत्र के पापों को भी क्षमा नहीं करता, तब उसका आचरण भी 'राजा का कर्तव्य' कहलाता है ॥32॥
 
When he protects everyone by his mind, speech and body and does not forgive even his son's sins, then his behavior is also called 'the duty of a king'. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)