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mahabharat 12.91.24: जब राजा के बहुत से सेवक देश में अन्याय करने लगते हैं, तब वह महान पाप राजा द्वारा ही किया जाता है ॥24॥   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  12.91.24 
राज्ञो यदा जनपदे बहवो राजपूरुषा:।
अनयेनोपवर्तन्ते तद् राज्ञ: किल्बिषं महत्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
जब राजा के बहुत से सेवक देश में अन्याय करने लगते हैं, तब वह महान पाप राजा द्वारा ही किया जाता है ॥24॥
 
When many of the king's servants begin to behave unjustly in the country, then that great sin is committed by the king himself. ॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)