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mahabharat 12.91.16: जो दुर्बल मनुष्य क्रोध की अग्नि से जलते हैं, उनके कुल में फिर अंकुर नहीं उगते। वे सम्पूर्ण शरीर को जला डालते हैं; इसलिए दुर्बल को कभी नहीं सताना चाहिए॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.91.16 
न हि दुर्बलदग्धस्य कुले किंचित् प्ररोहति।
आमूलं निर्दहन्त्येव मा स्म दुर्बलमासद:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जो दुर्बल मनुष्य क्रोध की अग्नि से जलते हैं, उनके कुल में फिर अंकुर नहीं उगते। वे सम्पूर्ण शरीर को जला डालते हैं; इसलिए दुर्बल को कभी नहीं सताना चाहिए॥16॥
 
The weak men who burn with the fire of their anger, no sprouts grow in their family again. They burn the whole body completely; therefore you should never harass the weak.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)