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mahabharat 12.91.15: हे प्रिय! तुम्हें दुर्बल लोगों को कभी भी अपमान का पात्र नहीं समझना चाहिए। सदैव सावधान रहना चाहिए कि दुर्बलों की दृष्टि तुम्हें, तुम्हारे मित्रों और सम्बन्धियों सहित जलाकर राख न कर दे ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.91.15 
दुर्बलांस्तात बुध्येथा नित्यमेवाविमानितान्।
मा त्वां दुर्बलचक्षूंषि प्रदहेयु: सबान्धवम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिय! तुम्हें दुर्बल लोगों को कभी भी अपमान का पात्र नहीं समझना चाहिए। सदैव सावधान रहना चाहिए कि दुर्बलों की दृष्टि तुम्हें, तुम्हारे मित्रों और सम्बन्धियों सहित जलाकर राख न कर दे ॥15॥
 
O dear! You should never consider weak people as objects of insult. Always be cautious so that the eyes of the weak do not burn you along with your friends and relatives to ashes. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)