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mahabharat 12.90.9: पिताश्री! यदि पाप करने की प्रवृत्ति पर अंकुश न लगाया जाए, तो सज्जन पुरुषों के लिए यह कहना असम्भव हो जाता है कि यह मेरी वस्तु है और उस समय कोई भी धर्म-व्यवस्था टिक नहीं सकती। ॥9॥   |   mahabharat अध्याय 12.90: उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 90: उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.90.9 
ममेदमिति नैवैतत् साधूनां तात धर्मत:।
न वै व्यवस्था भवति यदा पापो न वार्यते॥ ९॥
 
 
अनुवाद
पिताश्री! यदि पाप करने की प्रवृत्ति पर अंकुश न लगाया जाए, तो सज्जन पुरुषों के लिए यह कहना असम्भव हो जाता है कि यह मेरी वस्तु है और उस समय कोई भी धर्म-व्यवस्था टिक नहीं सकती। ॥9॥
 
Father! If the tendency to commit sins is not curbed, it becomes impossible for noble men to say that this is my thing and at that time, no religious system can survive. ॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)