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mahabharat 12.90.6: अत्यन्त धर्मात्मा और धनवान राजा धर्म का स्वरूप कहा गया है। यदि वह धर्म का पालन नहीं करता, तो लोग देवताओं की भी निन्दा करते हैं और वह धर्मात्मा नहीं, अपितु पापी कहलाता है ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 12.90: उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 90: उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.90.6 
राजा परमधर्मात्मा लक्ष्मीवान् धर्म उच्यते।
देवाश्च गर्हां गच्छन्ति धर्मो नास्तीति चोच्यते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
अत्यन्त धर्मात्मा और धनवान राजा धर्म का स्वरूप कहा गया है। यदि वह धर्म का पालन नहीं करता, तो लोग देवताओं की भी निन्दा करते हैं और वह धर्मात्मा नहीं, अपितु पापी कहलाता है ॥6॥
 
A very pious and wealthy king is said to be the embodiment of Dharma. If he does not follow Dharma, people criticize even the gods and he is not called a pious person, but a sinner. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)