Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.90.31-32: इसी प्रकार राजा को चाहिए कि वह एक बार बंदी बनाए गए मंत्री से, विशेषकर पराई स्त्रियों से, ऊँचे-नीचे और दुर्गम पर्वतों से, हाथी-घोड़ों और सर्पों से दूर रहे। इनसे सदैव सावधान रहे और रात्रि में विचरण करना छोड़ दे। कृपणता, अभिमान, अहंकार और क्रोध का भी पूर्णतः त्याग कर दे। (31-32)   |   mahabharat अध्याय 12.90: उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 90: उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  12.90.31-32 
निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषत:।
पर्वताद् विषमाद् दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात् सरीसृपात्॥ ३१॥
एतेभ्यो नित्ययत्त: स्यान्नक्तंचर्यां च वर्जयेत्।
अत्यागं चाभिमानं च दम्भं क्रोधं च वर्जयेत्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार राजा को चाहिए कि वह एक बार बंदी बनाए गए मंत्री से, विशेषकर पराई स्त्रियों से, ऊँचे-नीचे और दुर्गम पर्वतों से, हाथी-घोड़ों और सर्पों से दूर रहे। इनसे सदैव सावधान रहे और रात्रि में विचरण करना छोड़ दे। कृपणता, अभिमान, अहंकार और क्रोध का भी पूर्णतः त्याग कर दे। (31-32)
 
Similarly, the king should keep away from the minister who has been imprisoned once, especially from other women, from high and low and inaccessible mountains, and from elephants, horses and snakes. He should always be cautious of these and stop roaming around at night. He should also completely abandon miserliness, pride, arrogance and anger. 31-32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)