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mahabharat 12.9.5: मैं प्रतिदिन दो बार स्नान करके यथासमय अग्निहोत्र करूँगा और अल्प आहार करके शरीर को दुर्बल करूँगा। मृगचर्म और छाल के वस्त्र धारण करूँगा और सिर पर जटाएँ रखूँगा।॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.9.5 
जुह्वानोऽग्निं यथाकालमुभौ कालावुपस्पृशन्।
कृश: परिमिताहारश्चर्मचीरजटाधर:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मैं प्रतिदिन दो बार स्नान करके यथासमय अग्निहोत्र करूँगा और अल्प आहार करके शरीर को दुर्बल करूँगा। मृगचर्म और छाल के वस्त्र धारण करूँगा और सिर पर जटाएँ रखूँगा।॥5॥
 
After bathing twice a day, I will perform Agnihotra in due time and by eating limited food I will weaken my body. I will wear deerskin and bark clothes and keep matted hair on my head.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)