श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.9.4 
हित्वा ग्राम्यसुखाचारं तप्यमानो महत् तप:।
अरण्ये फलमूलाशी चरिष्यामि मृगै: सह॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मैं अज्ञानियों के भोग-विलास और रीति-रिवाजों को त्यागकर वन में कठोर तप करूंगा, कंद-मूल और फल खाऊंगा तथा मृगों के साथ विचरण करूंगा।
 
I will kick away the pleasures and customs of the ignorant and perform severe austerities in the forest; I will eat roots and fruits and roam with the deer.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)