श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.9.36 
तस्मात् प्रज्ञामृतमिदं चिरान्मां प्रत्युपस्थितम्।
तत् प्राप्य प्रार्थये स्थानमव्ययं शाश्वतं ध्रुवम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
आज बहुत समय के बाद मुझे यह ज्ञानरूपी अमृत प्राप्त हुआ है। इसे पाकर मैं अविनाशी, अपरिवर्तनशील और शाश्वत पद को प्राप्त करना चाहता हूँ॥ 36॥
 
Today, after a long time, I have received this nectar of wisdom. After receiving this, I want to achieve the imperishable, unchangeable and eternal state.॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)