श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.9.29 
वीतरागश्चरन्नेवं तुष्टिं प्राप्स्यामि शाश्वतीम्।
तृष्णया हि महत् पापमज्ञानादस्मि कारित:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार आसक्ति रहित होकर विचरण करने से मुझे शाश्वत संतोष प्राप्त होगा। अज्ञानवश लोभ ने मुझसे अनेक महान पाप करवाए हैं।
 
By moving about in this way without attachment, I will attain eternal satisfaction. Greed due to ignorance has made me commit many great sins.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)