श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.9.2 
साधुगम्यमहं मार्गं न जातु त्वत्कृते पुन:।
गच्छेयं तद् गमिष्यामि हित्वा ग्राम्यसुखान्युत॥ २॥
 
 
अनुवाद
मैं ग्राम्य सुख त्यागकर संतों के मार्ग पर चल सकता हूँ; परन्तु आपके आग्रह के कारण मैं राज्य कभी स्वीकार नहीं करूँगा॥ 2॥
 
I can give up village pleasures and follow the path of saints; but I will never accept the kingdom because of your insistence.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)