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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय
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श्लोक 18
श्लोक
12.9.18
अपृच्छन् कस्यचिन्मार्गं प्रव्रजन्नेव केनचित्।
न देशं न दिशं काञ्चिद् गन्तुमिच्छन् विशेषत:॥ १८॥
अनुवाद
मैं किसी भी मार्ग पर चलूँगा और किसी से रास्ता नहीं पूछूँगा। मैं किसी विशेष स्थान या दिशा में जाने की इच्छा नहीं रखूँगा॥18॥
I will walk on any path and will never ask anybody for directions. I will not wish to go to any particular place or direction.॥ 18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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