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mahabharat 12.9.15: मैं आत्मा का चिन्तन करके सुख पाऊँगा; मैं अपने मन को सदैव प्रसन्न रखूँगा; मैं किसी से कभी बात नहीं करूँगा; गूंगे, अंधे और बहरे की तरह न तो किसी से कुछ कहूँगा, न किसी को देखूँगा, न किसी की सुनूँगा॥ 15॥   |   mahabharat अध्याय 12.9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.9.15 
आत्माराम: प्रसन्नात्मा जडान्धबधिराकृति:।
अकुर्वाण: परै: काञ्चित् संविदं जातु कैरपि॥ १५॥
 
 
अनुवाद
मैं आत्मा का चिन्तन करके सुख पाऊँगा; मैं अपने मन को सदैव प्रसन्न रखूँगा; मैं किसी से कभी बात नहीं करूँगा; गूंगे, अंधे और बहरे की तरह न तो किसी से कुछ कहूँगा, न किसी को देखूँगा, न किसी की सुनूँगा॥ 15॥
 
I shall find happiness in thinking about the Self; I shall always keep my mind happy; I shall never talk to anybody; like the dumb, the blind and the deaf, I shall neither say anything to anybody, nor see anybody, nor listen to anybody.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)