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mahabharat 12.9.10: मैं एकान्त में रहकर अध्यात्म-चिंतन करूँगा और जो भी फल मुझे मिलेंगे, चाहे वे कच्चे हों या पके, उन्हें खाकर अपना निर्वाह करूँगा। मैं जंगली फल-मूल, मधुर वचन और जल से देवताओं और पितरों को तृप्त करता रहूँगा॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.9.10 
एकान्तशीली विमृशन् पक्वापक्वेन वर्तयन्।
पितॄन् देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मैं एकान्त में रहकर अध्यात्म-चिंतन करूँगा और जो भी फल मुझे मिलेंगे, चाहे वे कच्चे हों या पके, उन्हें खाकर अपना निर्वाह करूँगा। मैं जंगली फल-मूल, मधुर वचन और जल से देवताओं और पितरों को तृप्त करता रहूँगा॥10॥
 
Living in solitude, I will contemplate on spiritual principles and will live by eating whatever fruits I get, raw or ripe. I will keep satisfying the gods and ancestors with wild fruits and roots, sweet words and water.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)