श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 88: प्रजासे कर लेने तथा कोश-संग्रह करनेका प्रकार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.88.5 
जलौकावत् पिबेद् राष्ट्रं मृदुनैव नराधिप:।
व्याघ्रीव च हरेत् पुत्रान् संदशेन्न च पीडयेत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जैसे जोंक मनुष्य का रक्त धीरे-धीरे चूसती है, उसी प्रकार राजा को चाहिए कि वह प्रजा से कोमलता से कर वसूल करे। जैसे बाघिन अपने बच्चे को दांतों में दबाकर इधर-उधर घसीटती है; परंतु न तो उसे काटती है और न ही उसके शरीर को कष्ट देती है, उसी प्रकार राजा को चाहिए कि वह प्रजा का शोषण कोमलता से करे। ॥5॥
 
Just as a leech sucks the blood of a person slowly, similarly the king should collect taxes from the nation with tenderness. Just as a tigress drags her cub here and there holding it in her teeth; but neither bites it nor causes any pain to its body, similarly the king should exploit the nation with tender means. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)