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mahabharat 12.87.40: युधिष्ठिर! राजा को चाहिए कि वह वैश्यों के लिए ऐसी व्यवस्था करे कि वे देश में स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण कर सकें। राजा के लिए इससे बढ़कर कोई दूसरा कल्याणकारी कार्य नहीं है ॥40॥   |   mahabharat अध्याय 12.87: राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 87: राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.87.40 
सर्वत्र क्षेमचरणं सुलभं नाम गोमिषु।
न ह्यत: सदृशं किंचिद् वरमस्ति युधिष्ठिर॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! राजा को चाहिए कि वह वैश्यों के लिए ऐसी व्यवस्था करे कि वे देश में स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण कर सकें। राजा के लिए इससे बढ़कर कोई दूसरा कल्याणकारी कार्य नहीं है ॥40॥
 
Yudhishthira! The king should make such arrangements for the Vaishyas that they can travel freely in the country. There is no other work more beneficial for the king than this. ॥ 40॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राष्ट्रगुप्त्यादिकथने सप्ताशीतितमोऽध्याय:॥ ८७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राष्ट्रकी रक्षा आदिका वर्णनविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)