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mahabharat 12.87.36: यदि राजा वैश्यों के लाभ-हानि की परवाह न करके उन पर कर लगाकर उन्हें बहुत कष्ट देता है, तो वे राज्य छोड़कर वन में रहने लगते हैं; अतः उनके साथ विशेष कोमलता से व्यवहार करना चाहिए ॥ 36॥   |   mahabharat अध्याय 12.87: राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 87: राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.87.36 
उपेक्षिता हि नश्येयुर्गोमिनोऽरण्यवासिन:।
तस्मात् तेषु विशेषेण मृदुपूर्वं समाचरेत्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
यदि राजा वैश्यों के लाभ-हानि की परवाह न करके उन पर कर लगाकर उन्हें बहुत कष्ट देता है, तो वे राज्य छोड़कर वन में रहने लगते हैं; अतः उनके साथ विशेष कोमलता से व्यवहार करना चाहिए ॥ 36॥
 
If the king, without caring about the profit or loss of the Vaishyas, makes them suffer a lot by imposing taxes on them, then they leave the kingdom and start living in the forests; therefore, they should be treated with special tenderness. ॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)