श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 85: राजाकी व्यावहारिक नीति, मन्त्रिमण्डलका संघटन, दण्डका औचित्य तथा दूत, द्वारपाल, शिरोरक्षक, मन्त्री और सेनापतिके गुण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.85.4 
ये चैव पूर्वं कथिता गुणास्ते पुरुषं प्रति।
नैकस्मिन् पुरुषे ह्येते विद्यन्त इति मे मति:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मेरा मानना ​​है कि आपने पहले मनुष्य के जितने भी गुण बताये हैं, वे सब एक ही मनुष्य में नहीं मिल सकते।॥4॥
 
I believe that all the qualities that you have described earlier for a man cannot be found in just one man. ॥ 4॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd