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mahabharat 12.85.32: इनके अतिरिक्त उसे युद्ध-कला, यन्त्रों का प्रयोग और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने की कला में निपुण होना चाहिए, वह वीर होना चाहिए, शीत, ताप, आँधी और वर्षा के कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन करने वाला होना चाहिए और शत्रुओं के छिद्रों को समझने वाला होना चाहिए ॥32॥   |   mahabharat अध्याय 12.85: राजाकी व्यावहारिक नीति, मन्त्रिमण्डलका संघटन, दण्डका औचित्य तथा दूत, द्वारपाल, शिरोरक्षक, मन्त्री और सेनापतिके गुण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 85: राजाकी व्यावहारिक नीति, मन्त्रिमण्डलका संघटन, दण्डका औचित्य तथा दूत, द्वारपाल, शिरोरक्षक, मन्त्री और सेनापतिके गुण  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.85.32 
व्यूहयन्त्रायुधानां च तत्त्वज्ञो विक्रमान्वित:।
वर्षशीतोष्णवातानां सहिष्णु: पररन्ध्रवित्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
इनके अतिरिक्त उसे युद्ध-कला, यन्त्रों का प्रयोग और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने की कला में निपुण होना चाहिए, वह वीर होना चाहिए, शीत, ताप, आँधी और वर्षा के कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन करने वाला होना चाहिए और शत्रुओं के छिद्रों को समझने वाला होना चाहिए ॥32॥
 
Apart from these, he should be expert in the art of formation of battle formations, use of machines and the art of using different types of weapons, he should be brave, one who can bear the hardships of cold, heat, storm and rain patiently and one who understands the holes of the enemies. 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)