श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 85: राजाकी व्यावहारिक नीति, मन्त्रिमण्डलका संघटन, दण्डका औचित्य तथा दूत, द्वारपाल, शिरोरक्षक, मन्त्री और सेनापतिके गुण  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.85.23 
सम्यक् प्रणयतो दण्डं भूमिपस्य विशाम्पते।
युक्तस्य वा नास्त्यधर्मो धर्म एव हि शाश्वत:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
प्रजानाथ! जो राजा सोच-समझकर अपराधी को उचित दण्ड देता है और अपने कर्तव्य पालन में सदैव तत्पर रहता है, उसे मारने और बाँधने का पाप नहीं लगता, अपितु उसे सनातन धर्म की ही प्राप्ति होती है।
 
Prajanath! The king who thinks carefully and gives appropriate punishment to the criminal and is always ready to perform his duty does not incur the sin of killing and binding, but he only attains Sanatan Dharma.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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