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mahabharat 12.85.14: तब राष्ट्र के सभी लोग तुम्हें अन्यायी समझकर तुम्हारे पास से ऐसे भाग जाएँगे जैसे अन्य पक्षी बाज के डर से भाग जाते हैं और जैसे क्षतिग्रस्त नाव समुद्र में बह जाती है, वैसे ही लोग धीरे-धीरे तुम्हारे राज्य को छोड़कर अन्यत्र चले जाएँगे॥ 14॥   |   mahabharat अध्याय 12.85: राजाकी व्यावहारिक नीति, मन्त्रिमण्डलका संघटन, दण्डका औचित्य तथा दूत, द्वारपाल, शिरोरक्षक, मन्त्री और सेनापतिके गुण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 85: राजाकी व्यावहारिक नीति, मन्त्रिमण्डलका संघटन, दण्डका औचित्य तथा दूत, द्वारपाल, शिरोरक्षक, मन्त्री और सेनापतिके गुण  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.85.14 
विद्रवेच्चैव राष्ट्रं ते श्येनात् पक्षिगणा इव।
परिस्रवेच्च सततं नौर्विशीर्णेव सागरे॥ १४॥
 
 
अनुवाद
तब राष्ट्र के सभी लोग तुम्हें अन्यायी समझकर तुम्हारे पास से ऐसे भाग जाएँगे जैसे अन्य पक्षी बाज के डर से भाग जाते हैं और जैसे क्षतिग्रस्त नाव समुद्र में बह जाती है, वैसे ही लोग धीरे-धीरे तुम्हारे राज्य को छोड़कर अन्यत्र चले जाएँगे॥ 14॥
 
Then, considering you unjust, all the people of the nation will run away from you just as other birds run away in fear of eagles and just as a damaged boat drifts away in the sea, in the same way the people will gradually leave your kingdom and go elsewhere.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)