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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 84: इन्द्र और बृहस्पतिके संवादमें सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन बोलनेका महत्त्व  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.84.2 
शक्र उवाच
किं स्विदेकपदं ब्रह्मन् पुरुष: सम्यगाचरन्।
प्रमाणं सर्वभूतानां यशश्चैवाप्नुयान्महत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र ने पूछा, "ब्राह्मण! वह कौन सी वस्तु है जिसका एक ही नाम है और जिसका भली-भाँति अभ्यास करने से मनुष्य सभी प्राणियों का प्रिय हो जाता है और महान यश प्राप्त करता है?"
 
Indra asked, "Brahmin! What is that one thing which has only one name and by practicing it well, a person becomes loved by all creatures and achieves great fame?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)