श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 84: इन्द्र और बृहस्पतिके संवादमें सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन बोलनेका महत्त्व  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.84.11 
भीष्म उवाच
इत्युक्त: कृतवान् सर्वं यथा शक्र: पुरोधसा।
तथा त्वमपि कौन्तेय सम्यगेतत् समाचर॥ ११॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - हे कुन्तीपुत्र! जिस प्रकार इन्द्र ने अपने पुरोहित बृहस्पति के कहने पर सब कुछ वैसा ही किया था, उसी प्रकार तुम भी इन सान्त्वनादायक वचनों को यथावत् आचरण में लाओ।॥11॥
 
Bhishma says - O son of Kunti! Indra did everything in the same manner when his priest Brihaspati said so. Similarly, you should also put these comforting words into practice properly. ॥ 11॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि इन्द्रबृहस्पतिसंवादे चतुरशीतितमोऽध्याय:॥ ८४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवादविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)