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mahabharat 12.84.10: यदि मधुर, स्नेहमय और सान्त्वनादायक वचन बोले जाएँ और उनका प्रयोग हर समय, हर सम्भव प्रकार से किया जाए, तो उनके समान सम्मोहन का कोई दूसरा साधन इस संसार में नहीं है ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.84: इन्द्र और बृहस्पतिके संवादमें सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन बोलनेका महत्त्व   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 84: इन्द्र और बृहस्पतिके संवादमें सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन बोलनेका महत्त्व  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.84.10 
सुकृतस्य हि सान्त्वस्य श्लक्ष्णस्य मधुरस्य च।
सम्यगासेव्यमानस्य तुल्यं जातु न विद्यते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
यदि मधुर, स्नेहमय और सान्त्वनादायक वचन बोले जाएँ और उनका प्रयोग हर समय, हर सम्भव प्रकार से किया जाए, तो उनके समान सम्मोहन का कोई दूसरा साधन इस संसार में नहीं है ॥10॥
 
If sweet, affectionate and comforting words are spoken and they are used all the time in every possible way, then there is no other means of hypnotism like them in this world. ॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)