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mahabharat 12.83.36: जो व्यक्ति शत्रुओं से सम्बन्ध रखता है और अपने राज्य के नागरिकों का अधिक आदर नहीं करता, उसे मित्र नहीं समझना चाहिए। वह गुप्त मंत्रणा सुनने का भी अधिकारी नहीं है ॥36॥   |   mahabharat अध्याय 12.83: सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 83: सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.83.36 
योऽमित्रै: सह सम्बद्धो न पौरान् बहु मन्यते।
असुहृत् तादृशो ज्ञेयो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति शत्रुओं से सम्बन्ध रखता है और अपने राज्य के नागरिकों का अधिक आदर नहीं करता, उसे मित्र नहीं समझना चाहिए। वह गुप्त मंत्रणा सुनने का भी अधिकारी नहीं है ॥36॥
 
A person who has relations with enemies and does not have much respect for the citizens of his kingdom should not be considered as a friendly person. He is also not entitled to listen to secret advice. 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)