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mahabharat 12.83.17: इस प्रकार आचरण करने वाले बुद्धिमान पुरुष के शत्रु भी प्रसन्न होकर उससे मित्रता स्थापित कर लेते हैं ॥17॥   |   mahabharat अध्याय 12.83: सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 83: सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.83.17 
तस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्य विजानत:।
अमित्रा: सम्प्रसीदन्ति तथा मित्रीभवन्त्यपि॥ १७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार आचरण करने वाले बुद्धिमान पुरुष के शत्रु भी प्रसन्न होकर उससे मित्रता स्थापित कर लेते हैं ॥17॥
 
Even the enemies of a wise man who behaves like this become pleased and establish friendship with him. ॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)