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mahabharat 12.81.5: मैं अपनी श्रेष्ठता घोषित करके अपने भाई-बंधुओं को अपना दास नहीं बनाना चाहता। मुझे जो सुख मिलता है, उसका आधा ही मैं भोगता हूँ और आधा अपने बन्धुओं के लिए छोड़ देता हूँ। और उनके कटु वचन सुनकर भी मैं उन्हें क्षमा कर देता हूँ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.81: कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 81: कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.81.5 
दास्यमैश्वर्यवादेन ज्ञातीनां न करोम्यहम्।
अर्धं भोक्तास्मि भोगानां वाग्दुरुक्तानि च क्षमे॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मैं अपनी श्रेष्ठता घोषित करके अपने भाई-बंधुओं को अपना दास नहीं बनाना चाहता। मुझे जो सुख मिलता है, उसका आधा ही मैं भोगता हूँ और आधा अपने बन्धुओं के लिए छोड़ देता हूँ। और उनके कटु वचन सुनकर भी मैं उन्हें क्षमा कर देता हूँ॥5॥
 
I do not wish to make my brothers and relatives my slaves by declaring my supremacy. I consume only half of the pleasures I get and leave the other half for my relatives. And even after listening to their bitter words, I forgive them.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)