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mahabharat 12.81.3: एक समय भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - देवर्ष! जो मनुष्य उत्तम हृदय वाला नहीं है, जो उत्तम हृदय वाला तो है, किन्तु विद्वान नहीं है, तथा जो उत्तम हृदय वाला और विद्वान तो है, किन्तु अपने मन को वश में नहीं कर पाया है - ये तीनों ही परम गोपनीय सलाह सुनने या जानने के अधिकारी नहीं हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.81: कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.81.3 
वासुदेव उवाच
नासुहृत् परमं मन्त्रं नारदार्हति वेदितुम्।
अपण्डितो वापि सुहृत् पण्डितो वाप्यनात्मवान्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
एक समय भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - देवर्ष! जो मनुष्य उत्तम हृदय वाला नहीं है, जो उत्तम हृदय वाला तो है, किन्तु विद्वान नहीं है, तथा जो उत्तम हृदय वाला और विद्वान तो है, किन्तु अपने मन को वश में नहीं कर पाया है - ये तीनों ही परम गोपनीय सलाह सुनने या जानने के अधिकारी नहीं हैं।
 
Once upon a time Lord Shri Krishna said – Devarsha! A person who is not a good-hearted person, who is a good-hearted person but is not a learned person, and who is a good-hearted and learned person but has not been able to control his mind - all three are not entitled to hear or know the most confidential advice.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)