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mahabharat 12.81.20: भगवान श्रीकृष्ण बोले - ऋषिवर! मैं उस लौहहीन पदार्थ से बने कोमल अस्त्र को कैसे जान सकता हूँ, जिससे मैं इन सब लोगों की जीभों को चमकाकर, परिष्कृत करके उखाड़ सकता हूँ?   |   mahabharat अध्याय 12.81: कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 81: कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.81.20 
वासुदेव उवाच
अनायसं मुने शस्त्रं मृदु विद्यामहं कथम्।
येनैषामुद्धरे जिह्वां परिमृज्यानुमृज्य च॥ २०॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीकृष्ण बोले - ऋषिवर! मैं उस लौहहीन पदार्थ से बने कोमल अस्त्र को कैसे जान सकता हूँ, जिससे मैं इन सब लोगों की जीभों को चमकाकर, परिष्कृत करके उखाड़ सकता हूँ?
 
Lord Krishna said - Sage! How can I know about that soft weapon made of non-iron material, by which I can polish and refine the tongues of all these people and then pluck them out?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)