अध्याय 81: कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद
श्लोक 1: युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! यदि आपसी वैमनस्य के कारण बंधु-बांधवों के समुदाय को वश में करना असम्भव हो जाए, कुटुम्बियों में दो दल हो जाएँ, तो एक दल का आदर करने से दूसरा दल अवश्य ही क्रोधित होगा। ऐसी स्थिति के कारण यदि मित्र भी शत्रु बन जाएँ, तो उन सबके मन को कैसे वश में किया जा सकता है?॥1॥
श्लोक 2: भीष्मजी ने कहा-युधिष्ठिर! इस विषय में विद्वान लोग देवर्षि नारद और भगवान श्रीकृष्ण के वार्तालाप के पूर्व इतिहास का उदाहरण देते हैं। 2॥
श्लोक 3: एक समय भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - देवर्ष! जो मनुष्य उत्तम हृदय वाला नहीं है, जो उत्तम हृदय वाला तो है, किन्तु विद्वान नहीं है, तथा जो उत्तम हृदय वाला और विद्वान तो है, किन्तु अपने मन को वश में नहीं कर पाया है - ये तीनों ही परम गोपनीय सलाह सुनने या जानने के अधिकारी नहीं हैं।
श्लोक 4: हे स्वर्ग में विचरण करने वाले नारद! मैं आपकी सद्भावना पर भरोसा करके आपसे निवेदन करूँगा। मनुष्य किसी व्यक्ति की बुद्धि और बल की सम्पूर्णता देखकर ही उससे कुछ पूछता है या जिज्ञासा प्रकट करता है॥4॥
श्लोक 5: मैं अपनी श्रेष्ठता घोषित करके अपने भाई-बंधुओं को अपना दास नहीं बनाना चाहता। मुझे जो सुख मिलता है, उसका आधा ही मैं भोगता हूँ और आधा अपने बन्धुओं के लिए छोड़ देता हूँ। और उनके कटु वचन सुनकर भी मैं उन्हें क्षमा कर देता हूँ॥5॥
श्लोक 6: देवर्षे! जैसे अग्नि प्रकट करने की इच्छा रखने वाला मनुष्य अरणी की लकड़ी को मथता है, वैसे ही इन स्वजनों के कटु वचन मेरे हृदय को सदैव मथते और जलाते रहते हैं॥6॥
श्लोक 7: हे नारद! बड़े भाई बलरामजी में तो अपार बल रहता है; वे उसी में मग्न रहते हैं। छोटा भाई गद बड़ा सुकुमार है (अतः परिश्रम से दूर भागता है); पुत्र प्रद्युम्न तो अपनी सुन्दरता के अभिमान में मदमस्त रहता है। इन सहायकों के होते हुए भी मैं असहाय हूँ। 7.
श्लोक 8: हे नारद! अंधक और वृष्णि कुल में और भी बहुत से शूरवीर पुरुष हैं, जो अत्यंत भाग्यशाली, बलवान और वीर हैं; वे सभी सदैव परिश्रमी रहते हैं॥8॥
श्लोक 9: जिसके पक्ष में ये वीर न हों, उसका जीवित रहना असम्भव है और ये जिसका पक्ष लेंगे, वही सम्पूर्ण समुदाय विजयी होगा। किन्तु आहुक और अक्रूर ने आपस में शत्रुता करके मुझे ऐसा विघ्न डाला है कि मैं उनमें से किसी का भी पक्ष नहीं ले सकता॥9॥
श्लोक 10: जिसके सम्बन्धी युद्धरत आहुक और अक्रूर ही हों, उसके लिए इससे अधिक दुःख की बात क्या हो सकती है? और जिसके मित्र वे दोनों ही न हों, उसके लिए इससे अधिक दुःख की बात क्या हो सकती है? (क्योंकि ऐसे मित्रों का अभाव भी अत्यन्त दुःखदायी होता है)॥10॥
श्लोक 11: श्रीमान्, जिस प्रकार दो जुआरियों की माता एक की विजय की कामना करती है और दूसरे की पराजय की कामना नहीं करती, उसी प्रकार मैं भी इन दोनों मित्रों में से एक की विजय की कामना करता हूँ और दूसरे की पराजय की कामना नहीं करता।
श्लोक 12: नारदजी! इस प्रकार, चूँकि मैं सदैव दोनों पक्षों का भला चाहता हूँ, इसलिए मुझे दोनों ओर से कष्टों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में, कृपया मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरा और इन जाति-बंधुओं का भी कल्याण हो सके।
श्लोक 13: नारदजी बोले - वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण ! आपत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं - एक बाह्य और दूसरी आन्तरिक। दोनों ही दो प्रकार की होती हैं - स्वकृत 1 और परकृत 2 ॥13॥
श्लोक 14: अक्रूर और आहुका के द्वारा जो यह दुःखदायी विपत्ति तुम पर आई है, वह आंतरिक है और तुम्हारे ही कर्मों के कारण प्रकट हुई है। जिन लोगों के नाम तुमने बताए हैं, वे सब तुम्हारे ही वंश के हैं॥14॥
श्लोक 15: जो धन तुमने स्वयं अर्जित किया था, उसे तुमने किसी प्रयोजन से, स्वेच्छा से अथवा कटुवचनों के भय से दूसरे को दे दिया ॥15॥
श्लोक 16: हे श्रीकृष्ण! हे सहायक! इस समय उग्रसेन को दिया गया धन दृढ़ हो गया है। उसकी जाति के लोग भी उग्रसेन की सहायता कर रहे हैं; अतः थूके हुए अन्न के समान तुम दिया हुआ धन वापस नहीं ले सकते॥16॥
श्लोक 17: श्री कृष्ण! औरों की तो बात ही छोड़िए, आप भी इतने शक्तिशाली होकर भी भाइयों में फूट पड़ने के भय से अक्रूर और उग्रसेन के हाथ में गया राज्य वापस नहीं ले सकते।
श्लोक 18: बड़े प्रयत्न और अत्यन्त कठिन कार्य से महाविनाशकारी युद्ध करके राज्य को पुनः प्राप्त करने का कार्य सम्पन्न किया जा सकता है, परन्तु इसमें बहुत धन लगेगा और फिर असंख्य लोगों का विनाश होगा ॥18॥
श्लोक 19: इसलिए हे श्रीकृष्ण! एक ऐसे कोमल अस्त्र से, जो लोहे का न होने पर भी हृदय को छेदने में समर्थ है, खुरचकर और छीलकर उन सबकी जीभें उखाड़ लो - उन्हें गूंगा कर दो (जिससे फिर झगड़ा शुरू न हो)।॥19॥
श्लोक 20: भगवान श्रीकृष्ण बोले - ऋषिवर! मैं उस लौहहीन पदार्थ से बने कोमल अस्त्र को कैसे जान सकता हूँ, जिससे मैं इन सब लोगों की जीभों को चमकाकर, परिष्कृत करके उखाड़ सकता हूँ?
श्लोक 21: नारद बोले, "श्रीकृष्ण! सदैव अपनी शक्ति के अनुसार अन्नदान करना, धैर्य, सरलता, सौम्यता और आवश्यकतानुसार पूजन करना - ये बिना लोहे के बने हुए शस्त्र हैं।"
श्लोक 22: जब आपके सहजातीय सदस्य आपसे कड़वी या बुरी बातें कहने का प्रयास करें, तो आपको उनके हृदय, वाणी और मन को शांत करने के लिए मीठे शब्द बोलने चाहिए।
श्लोक 23: जो महापुरुष नहीं है, जिसने अपने मन को वश में नहीं किया है और जिसे सहायकों का आशीर्वाद नहीं है, वह कोई भी भारी बोझ नहीं उठा सकता। इसलिए तुम इस भारी बोझ को अपने हृदय से उठाकर सहन करो॥ 23॥
श्लोक 24: सभी बैल समतल भूमि पर भारी बोझ उठा सकते हैं; तथापि, केवल अच्छे बैल ही भारी बोझ उठा सकते हैं, जिसे उबड़-खाबड़ भूमि पर ले जाना कठिन होता है।
श्लोक 25: केशव! आप इस यादव संघ के प्रधान हैं। यदि इसमें फूट पड़ गई, तो यह सम्पूर्ण संघ नष्ट हो जाएगा; अतः आप ऐसा कुछ करें जिससे आपको पाकर यह संघ - यह यादव गणराज्य राज्य नष्ट न हो जाए॥ 25॥
श्लोक 26: बुद्धि, क्षमा और इन्द्रिय-नियंत्रण के बिना तथा धन और वैभव का त्याग किए बिना कोई भी समूह या संगठन बुद्धिमान व्यक्ति के अधीन नहीं रहता।
श्लोक 27: श्री कृष्ण! तुम्हारा पक्ष सदैव ऐसी उन्नति करे जिससे तुम्हारा धन, यश और आयु बढ़े तथा तुम्हारे कुल का कोई भी सदस्य नष्ट न हो। यह सब तुम यथाशक्ति करो॥ 27॥
श्लोक 28: हे प्रभु! संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधिभाव और समाश्रय - इन छह गुणों का उचित समय पर प्रयोग करके शत्रु पर आक्रमण करने के लिए प्रयाण करने से वर्तमान या भविष्य में क्या फल होगा? यह सब आपसे छिपा नहीं है। 28॥
श्लोक 29-30h: महाबाहु माधव! कुकुर, भोज, अंधक और वृष्णिवंश के सभी यादव आपसे प्रेम करते हैं। अन्य लोग और यहाँ तक कि लोकों के स्वामी भी आपसे प्रेम करते हैं। अन्य लोगों की तो बात ही क्या? बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी आपकी बुद्धि का आश्रय लेते हैं॥ 29 1/2॥
श्लोक 30: आप समस्त प्राणियों के गुरु हैं। आप भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता हैं। आप जैसे महापुरुष की शरण में आकर सभी यादव सुखपूर्वक उन्नति करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥