श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.80.6 
चतुर्णां मध्यमौ श्रेष्ठौ नित्यं शङ्कॺौ तथापरौ।
सर्वे नित्यं शङ्कितव्या: प्रत्यक्षं कार्यमात्मन:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उपर्युक्त चार प्रकार के मित्रों में भजमान और सहज - ये बीच के दो मित्र श्रेष्ठ माने गए हैं, परन्तु शेष दो के विषय में सदैव संशय रखना चाहिए। वस्तुतः अपने कार्य को ध्यान में रखते हुए सभी प्रकार के मित्रों से सदैव सावधान रहना चाहिए। 6॥
 
Among the above mentioned four types of friends, Bhajman and Sahaj – these middle two friends are considered the best, but one should always be suspicious about the remaining two. In fact, keeping your work in mind, you should always be cautious of all types of friends. 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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