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श्लोक 12.80.41  |
य एवं वर्तते नित्यं ज्ञातिसम्बन्धिमण्डले।
मित्रेष्वमित्रे मध्यस्थे चिरं यशसि तिष्ठति॥ ४१॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य कुटुम्बियों, सम्बन्धियों, मित्रों, शत्रुओं और मध्यस्थों की संगति में सदैव इसी नीति से आचरण करता है, वह दीर्घकाल तक प्रसिद्ध रहता है ॥ 41॥ |
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| He who always behaves with this policy in the company of family members, relatives, friends, enemies and mediators remains famous for a long time. ॥ 41॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अशीतितमोऽध्याय:॥ ८०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८०॥
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