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श्लोक 12.80.40  |
अस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्याप्रमादिन:।
अमित्रा: संप्रसीदन्ति तथा मित्रीभवन्त्यपि॥ ४०॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य सदैव सावधान रहता है और इस प्रकार आचरण करता है, उसके शत्रु भी प्रसन्न होकर उसके साथ मित्रवत व्यवहार करने लगते हैं ॥40॥ |
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| The man who always remains cautious and behaves like this, even his enemies become happy and start behaving like friends with him. ॥ 40॥ |
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