श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  12.80.4-5 
धर्मात्मा पञ्चमश्चापि मित्रं नैकस्य न द्वयो:।
यतो धर्मस्ततो वा स्याद् धर्मस्थो वा ततो भवेत्॥ ४॥
यस्तस्यार्थो न रोचेत न तं तस्य प्रकाशयेत् ।
धर्माधर्मेण राजानश्चरन्ति विजिगीषव:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
इनके अतिरिक्त राजा का पाँचवाँ मित्र धर्मात्मा होता है, वह किसी एक पक्ष का पक्षपाती नहीं होता, न दोनों पक्षों से वेतन लेता है और न छल से दोनों का मित्र बना रहता है। वह उस पक्ष में सम्मिलित होता है जहाँ धर्म होता है अथवा जो राजा धर्मात्मा होता है, वह उसका आश्रय लेता है। ऐसे धर्मात्मा को जो कार्य प्रिय न हो, उसे उसे नहीं बताना चाहिए; क्योंकि विजय चाहने वाले राजा कभी धर्म के मार्ग पर चलते हैं और कभी अधर्म के मार्ग पर॥4-5॥
 
Apart from these, the fifth friend of the king is a righteous man, he is not biased towards any one side, nor does he take salary from both the parties and deceitfully remains a friend of both. He joins the side of the side where there is righteousness or the king who is righteous takes shelter of him. The work which does not please such a righteous man should not be revealed to him; because kings who desire victory sometimes follow the path of righteousness and sometimes the path of unrighteousness.॥ 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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