श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.80.37 
नाज्ञातिरनुगृह्णाति न चाज्ञातिर्नमस्यति।
उभयं ज्ञातिवर्गेषु दृश्यते साध्वसाधु च॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
दूसरी जाति का व्यक्ति न तो किसी पर कृपा करता है और न ही किसी को नमस्कार करता है। इस प्रकार एक ही जाति के भाइयों में अच्छाई और बुराई दोनों देखी जाती है। 37.
 
A person belonging to another caste neither shows favour nor greets another. In this way both good and bad are seen among the brothers of the same caste. 37.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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