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श्लोक 12.80.37  |
नाज्ञातिरनुगृह्णाति न चाज्ञातिर्नमस्यति।
उभयं ज्ञातिवर्गेषु दृश्यते साध्वसाधु च॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| दूसरी जाति का व्यक्ति न तो किसी पर कृपा करता है और न ही किसी को नमस्कार करता है। इस प्रकार एक ही जाति के भाइयों में अच्छाई और बुराई दोनों देखी जाती है। 37. |
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| A person belonging to another caste neither shows favour nor greets another. In this way both good and bad are seen among the brothers of the same caste. 37. |
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