श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  12.80.28-29 
कुलीन: शीलसम्पन्नस्तितिक्षुरविकत्थन:।
शूरश्चार्याश्च विद्वांश्च प्रतिपत्तिविशारद:॥ २८॥
एते ह्यमात्या: कर्तव्या: सर्वकर्मस्ववस्थिता:।
पूजिता: संविभक्ताश्च सुसहाया: स्वनुष्ठिता:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
आपको ऐसे लोगों को मंत्री बनाना चाहिए जो कुलीन हों, चरित्रवान हों, सहनशील हों, मिथ्या प्रशंसा न करते हों, वीर हों, श्रेष्ठ हों, विद्वान हों और उचित-अनुचित को समझने में कुशल हों। वे आपके सभी कार्यों में नियोजित होने के योग्य हों। आपको उन्हें आदरपूर्वक सुख-सुविधा की वस्तुएँ देनी चाहिए। इस प्रकार आदरपूर्वक स्वीकार किए जाने पर वे आपके अच्छे सहायक सिद्ध होंगे।॥28-29॥
 
You should appoint as ministers those who are of noble lineage, have good character, are tolerant, do not indulge in false self-praise, are valiant, excellent, learned and are adept in understanding what is right and what is wrong. They are fit to be employed in all your works. You should respectfully give them things of comfort and convenience. Thus, being accepted with respect, they will prove to be your good helpers.॥28-29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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