श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.80.16 
यस्तु वृद्धॺा न तृप्येत क्षये दीनतरो भवेत्।
एतदुत्तममित्रस्य निमित्तमिति चक्षते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जो राजा की उन्नति से कभी संतुष्ट नहीं होता, उसकी अधिकाधिक उन्नति की कामना करता रहता है और उसकी अवनति होने पर अत्यन्त दुःखी होता है, वही अच्छे मित्र का लक्षण है ॥16॥
 
The one who is never satisfied with the progress of the king, keeps on desiring more and more progress for him and becomes very sad when he declines is the mark of a good friend. ॥16॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd