श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.80.14 
यस्य क्षेत्रादप्युदकं क्षेत्रमन्यस्य गच्छति।
न तत्रानिच्छतस्तस्य भिद्येरन् सर्वसेतव:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जिस व्यक्ति के खेत से होकर वर्षा का पानी दूसरे के खेत में जाता हो, उसके खेत की सीमा या किनारा उसकी सहमति के बिना नहीं तोड़ना चाहिए ॥14॥
 
The boundary or border of the field of the person through whose field rain water passes to reach another's field should not be broken without his consent. ॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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