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mahabharat 12.8.7: हे मनुष्यों के स्वामी! जब आप इस समृद्ध राज्य को छोड़कर हाथ में घड़ा लेकर घर-घर जाकर भिक्षा मांगने का नीच कार्य अपना लेंगे, तब लोग आपके विषय में क्या कहेंगे?   |   mahabharat अध्याय 12.8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.8.7 
कापालीं नृप पापिष्ठां वृत्तिमासाद्य जीवत:।
संत्यज्य राज्यमृद्धं ते लोकोऽयं किं वदिष्यति॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जब आप इस समृद्ध राज्य को छोड़कर हाथ में घड़ा लेकर घर-घर जाकर भिक्षा मांगने का नीच कार्य अपना लेंगे, तब लोग आपके विषय में क्या कहेंगे?
 
O Lord of men! When you leave this prosperous kingdom and adopt the lowly occupation of begging from door to door with a pot in your hand, what will people say of you then?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)