Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.8.6: जिसके कल्याण के साधन नष्ट हो गए हों, जो सर्वथा दरिद्र हो, संसार में जिसकी कोई कीर्ति न हो, जिसे स्त्री, पुत्र और पशु आदि सुख न मिले हों तथा जो अपनी असमर्थता के कारण अपने बल से किसी का राज्य या धन लेने की इच्छा न कर सकता हो, उसी मनुष्य को भिक्षावृत्ति द्वारा जीविका चलाने की इच्छा करनी चाहिए ॥6॥ | mahabharat अध्याय 12.8: अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यो ह्याजिजीविषेद् भैक्ष्यं कर्मणा नैव कस्यचित्।
समारम्भान् बुभूषेत हतस्वस्तिरकिंचन:।
सर्वलोकेषु विख्यातो न पुत्रपशुसंहित:॥ ६॥
अनुवाद
जिसके कल्याण के साधन नष्ट हो गए हों, जो सर्वथा दरिद्र हो, संसार में जिसकी कोई कीर्ति न हो, जिसे स्त्री, पुत्र और पशु आदि सुख न मिले हों तथा जो अपनी असमर्थता के कारण अपने बल से किसी का राज्य या धन लेने की इच्छा न कर सकता हो, उसी मनुष्य को भिक्षावृत्ति द्वारा जीविका चलाने की इच्छा करनी चाहिए ॥6॥
The person whose means of welfare have been destroyed, who is absolutely poor, who has no fame in the world, who is not blessed with wife, children and animals etc. and who due to his inability cannot desire to take anybody's kingdom or wealth by his might, only that person should aspire to earn his living by begging. ॥ 6॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥